- पुस्तक का परिचय (Introduction to the Book)
- पुस्तक का शीर्षक प्रधान आदिवासी सभ्यता
- लेखक का नाम मंसाराम कुमरे
- प्रकाशन वर्ष,
- प्रकाशन , जय सेवा प्रकाशन हिंगणा रोड नागपुर
- उपन्यास, आदिवासी साहित्य
- पुस्तक की पृष्ठभूमि: आदिवासी साहित्य एतिहासिक संदर्भ।आदिवासी
- लेखक परिचय
- लेखक का लेखन मुख्य रूप से आदिवासी संस्कृति और सामाजिक उत्थान को दृष्टिगत रखते हुए लिखा गया है लेखक को आदिवासी साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में कई सम्मान प्राप्त है यह लेखन सामाजिक एतिहासिक संदर्भो के माध्यम से प्रधान जाति के बारे में बताने का प्रयास किया है|
- लेखन शैली (Writing Style)
- लेखक ने प्रधान जाति के नामकरण और अन्य कालो और यूगो में किन किन नामो से जाना जाता था बताया है
- जो वर्तमान में आदिवासी जनजाति के रूप में जाना जाता है उन्हें कालांतर में दस्यु दास पणी असुर कहा जाता था रामायणकाल में राक्षस कहकर संबोधन किया जाता था वैदिक युग में पणी पनका को वर्त्तमान का प्रधान बताया गया है इनका वंशजो का इतिहास सिन्धु घाटी सभ्यता से होने की बात कही गई है
- इन्हें नैसर्गिक पूजक(प्राकृतिक पूजक माना गया है) वर्तमान में इनपर हिन्दू संस्कृति थोपकर इनको मानसिक गुलाम बनाने की बात कही गई है
- पंडित नेहरु का मानना था की भारतीय सभ्यता का शिल्पकार के जनक आदिवासी थे उनके पुस्तक "आदिवासी सभ्यता " से ज्ञात होता है
- आदिवासी सभ्यता लगभग 8000 वर्ष पुरानी है ,,,इनकी सत्यता और सबूतों को आर्यों ने मिटाने के लिए छल बल कपट नीतियों का सहारा लिया और अपने मकसद में कामयाब भी हुए
- प्रधान आदिवासी जनजाति को (लिंगोदेव) का पूजक माना गया है इनको बोलचाल की भाषा में "परधान" नाम से भी संबोधित किया जाता है इनके प्रमुख देवी देवता फड़ापेन , परसापेन, नारायणपेन, भीमालपेन, राहुल पेन, माना गया है और देवियों के नाम जंगोरायताड , जानको, मानको माना गया है साथ प्रधान जनजाति को बौद्ध धर्मी भी बताया गया है
- विभिन्न लेखको के द्वारा आदिवासियों को अलग अलग नामो से संबोधित किया गया है जैसे एलिवन रिग्सन, रिझले लस्सी, सुबर्न टूलेंट, मार्टिन ने (abriginal अबिरिजिनल, aboriginal एबोरिजिनल) से संबोधित किया है तो वहीं हटन ने इन्हें (प्रिमिटिव ट्राइब्स primitive tribes) कहा है
- ब्रिटिश अधिकारियो ने 1881 में पहली बार जाति आधारित एव व्यवसाय केआधार पर जनगणना करने की कोशिश किये तथा उन्होंने 1901 में आदिवासियों को प्राकृतिक पूजक के रूप में जनगणना में स्थान दिया, 1921 में वन्य जाति के रूप में जनसंख्या एक करोड़ साठ लाख तथा 1935 में पिछड़ी जनजाति से संबोधित किया, 1941 में पशुपालक के रूप में जनगणना में स्थान दिया तथा जनसँख्या दो करोड़ सयतालिस लाख बताया गया है डॉ भीमराव अबेडकर के अनुसार आदिवासी सामान्य शब्द है इनका कोई वैधानिक अर्थ नही है, इसलिए आंबेडकर जी ने इन्हें जनजाति नाम से संबोधित किया
- लेखक के अनुसार भारत का नाम दुष्यत के पुत्र भरत के नाम से नही अपितु राजा दिवोदास के पुत्र भरत के नाम से पड़ा है इस राजवंश के कई महान राजा हुए वृतासुर इसको मारने की कहानी ऋग्वेद में कही गई है इनका शासन पंजाब पाकिस्तान उतरी क्षेत्र में फैलि थी इन्हें आर्यों के राजा इंद्र ने मार डाला,वृतासुर के पश्चात भरत नाम का राजा हुआ इसके नाम से देश का नाम पड़ा भारत, उसके पश्चात शम्बर ऋग्वेद में इसका जिक्र २० बार हुआ है इसका शासन क्षेत्र पंजाब के पहाड़ी इलाके में था राहुल सांकृत्यायन के मतानुसार हिमालय कांगड़ा पहाड़ी क्षेत्र में इनका सत्ता था इनके वीर सेनापतियो के नाम भी बताया गया है शुष्ण, वगृद, करंज, पर्णज, पिप्रु, वर्चो, इसके पश्चात बाणासुर हुए इनका शासन पंजाब हरियाणा राजस्थान तक फैले थे इन्होने आर्यों द्वारा वृतासुर से जीती हुई शासन वापस जित ली,,,महिषासुर इसको आर्यों के सुन्दर कन्याओ ने शराब में जहर मिलाकर मार डाला , बंगासुर जिसके नाम से बंगाल का नामकरण हुआ है,,,उदिश्र्व जिसके नाम से उड़ीसा का नामकरण हुआ है
- प्रधान जनजाति को सिन्धु सभ्यता से माना जाता है श्री आर.पी.चंद्रा के अनुसार ऋग्वेद में उल्लेखित पणी शब्द इनके जन्मदाता है
- डॉ. बनर्जी के अनुसार असुर सिन्धु सभ्यता के संस्थापक थे,
- व्यंकटेश आत्राम के अनुसार वैदिक काल में पणी - पनका वर्तमान काल के पालाल प्रधान आदिवासी है
- वैसे ही श्री ए.ए. मेकडोनेल्ड, रामकुमार राय, विध्यांकर, पंडित द्वारकाप्रसाद, डॉ. पी.जी.वेल्नकर, आदि ने भी पणी को पनका असुर और प्रधान माना है
- सिन्धु, हड्ड्प्पा सभ्यता को आर्यों ने नष्ट किया विभिन्न इतिहासकारों और लेखको का मानना है जैसे गार्डन चाइल्ड ,सर मार्टिमर, व्हीलर,. ए. मैके स्टुअर्ट पिग्ट, मैक्समुलर, पी. एन देशपांडे, डॉ . प्रकाश खरात आदि ने माना है की यह सभ्यता आर्यों ने नष्ट किया है
- राहुल सांकृत्यायन ने अपने पुस्तक गोल्गा ते गंगा में लिखा है आदिकाल से लगभग 6 हजार वर्षो से गोल्गा नदी के किनारे बसी जनजाति जिसमे मातृसत्ता इनके परिवार की मुख्या महिला होती है वह जनजाति प्रधान है जंहा मातृप्रधान है इनकी सामाजिक व्यवस्था टोटमवाद है इनकी मुख्या चार साखा है 1कोलासुर 2 सुगाल, 3 हिराज्योति, 4 फलोर ये चारो टोटम देव है
- संस्कार
- जन्म संस्कार मुख्यतः 12 दिनों में किया जाता है
- विवाह संस्कार में 4 देव , 5 देव, 6 देव, 7 देव, होते है सम विषम गोत्र में ही वैवाहिक सम्बन्ध होते है
- मृत्यु संस्कार इनमे मिटटी देने की परम्परा है 3 दिनों तक शोकापन के बाद ४थे दिन मरनी कार्यक्रम होता है
- देव पूजा मृत आत्मा को देव मिलाने की परम्परा है स्त्री पुरुष के आत्मा को गोत्र देव में समिलित किया जाता है यह विधि भूमकाल द्वारा संपन्न की जाती है मृत व्यक्ति को देव रूप में देवघर में स्थापित किया जाता है इस विधि में मुर्गे और बकरे की बली दी जाती है
- गीत नृत्य
- पठारी पाटा शादी में
- शिमंगा पाटा होली में
- बिरवा पाटा देव में सुमरनी
- सैला पाटा बरसात में
- अव्वाल जन्म मे
- पटार नृत्य देव काम में
- ढेमसा नृत्य समारोह में
- दोहरा नृत्य तरुण तरुणी के द्वारा एकत्रित होकर
- मंडराना नृत्य शादी में
- बिरवा नृत्य त्योहारों में
उपजाति और कार्य
1 परधान प्रधान - पुरोहित
2 पठारी - गाना गाने वाला भाट
3 भूमकाल - देव पुजारी
4 मोकाशी - पंचायत प्रधान
5 देसाईं - राजस्व वसूली
गोंड और प्रधान के उप गोत्र और गोत्र में समानता होते हुए भी बेटी रोटी लेनदेन नही होता
कमी या सीमा
- रामटेक को एक जगह पेज 25 में यह कहा गया है की रामटेक का नाम लक्ष्मणपाल बौद्ध राजा के भाई राम के नाम से रामटेक पड़ा क्योकि वह वंहा बस गया न की आर्य वाले राम के नाम पर,, परन्तु पेज नंबर 30 में कहा गया है की राजा रघु जी भोसले ने सन 1773 में देवगढ़ के गोंडराजा वली शाह पर आक्रमण किया था और मन में प्रतिज्ञा किया की अगर वह लड़ाई जितने पर राम की मूर्ति स्थापना करूँगा विज्योप्रांत उन्होंने जयपुर राजस्थान से राम की मूर्ति लाकर रामटेक में मंदिर स्थापित किया तब से इनका नाम रामटेक पड़ा जो की दोनों विरोधभास विचारधारा है
- प्रधान जनजाति को बौद्ध और जैन धर्म प्रचारक बताना यह काल्पनिक लगता है पेज नंबर ३१ में जैन धर्म के प्रचारक के रूप में दर्शाया गया है नाम धनपाल, श्रीपाल, श्रीलाल देव, श्रीमाल देव इन्हें 4 गोत्रीय मुनि बताया गया है
- गौतम बौद्ध और लिंगो दर्शन में साम्यता स्थापित करने की कोशिश की गई है पेज नंबर 24 में आलाम कलाम द्वारा गौतम बुद्ध को लिंगो दर्शन का पाठ पढ़ाना फिर गौतम बुद्ध द्वारा आदिवासियों को सत्य अहिंसा का संदेश देना यह साम्यता स्थापित करने की एक प्रयास मात्र है
- कई जगहों पर गोंड जनजाति से समानता बहुत अधिक बताया गया है जैसे प्रधान जनजाति अपने को गोंड मानते है कहा गया है कई जगह एकदम अलग कर दिया है गया है जैसे पेज नंबर 36 में कहा गया है जब आदिशंकराचार्य ने शैव धर्म का प्रचार किया तो कोइतुर गोंड ने उनका साथ दिया पर प्रधान ने बुद्ध का साथ दिया जब भारत में मुस्लिम आक्रम हुआ तो कई गोंड राजाओ ने मुस्लिम स्वीकार लिया पर प्रधान प्रजा ने न सलाम स्वीकारा न ही अत्याचार सहे, ,,,जिन्होंने अपने संस्कृति बचाई वह थे असली राजप्रधान ,,,जिन्होंने मुसलमान स्वीकारा वह थे राज गोंड साथ ही पेज नंबर 39 में कहा गया है प्रधानो ने अपना स्वाभिमान संस्कृति धर्म मातृभूमि की रक्षा की वही गोंडो ने आर्यों मुसलमानों से समझोता करके राजपाठ चलाया पर प्रधानो ने अपना आत्म स्वाभिमान के कारण किसी से समझौता नही किया
निष्कर्ष:-
- लेखक ने इस पुस्तक के माध्यम से प्रधान जनजाति के सभी पक्षों को पाठको के मध्य रखने की कोशिश की है यह बहुत ही सराहनीय कदम है व इसमें कई स्रोत से जो सन्दर्भ दिया गया है और श्रोतो का प्रयोग करके और सारगर्भित बनाया जा सकता था, प्रधान आदिवासी सभ्यता प्रधान जनजाति के अधिकतर पक्षों को उजागर किया है इसे सभी शोधकर्ता जो शोध कर रहे है जनजाति पर इसे अवश्य पढ़ सकते है और आदिवासी संस्कृति और रीतिरिवाजो में रूचि रखने वालो के लिए यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक हो सकती है आज के लिए बस इतना ही जय जोहार जय माँ दंतेश्वरी
अपील :- अगर आप चाहते है की आपके बताये पुस्तक का समीक्षा और विश्लेष्ण करू तो आप आगे बटन पर क्लीक कर पुस्तक का नाम और विवरण भेजे



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